
दिल्ली: जिस सदन में राहुल गांधी ने महिला आरक्षण बिल को गिराने का कृत्य किया, वही सदन भविष्य में महिलाओं को उनका अधिकार देकर इतिहास रचेगा । दिल्ली की चांदनी चौक लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने साधा निशाना कहा कि यदि यह विधेयक पारित होता, तो कांग्रेस के भीतर प्रियंका गांधी एक सशक्त और प्रभावशाली नेतृत्व के रूप में उभर सकती थीं और संभवतः इसी राजनीतिक आशंका ने राहुल गांधी को इस बिल के विरोध के लिए प्रेरित किया । महिला आरक्षण विधेयक के संसद में पारित न होने को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का “काला अध्याय” करार देते हुए उन्होंने राहुल गांधी सहित कांग्रेस और समूचे विपक्ष पर तीखा प्रहार किया। पत्रकारवार्ता में चांदनी उनके साथ भाजपा के जिलाध्यक्ष अरविंद गर्ग एवं केशवपुरम भाजपा के जिलाध्यक्ष अजय खटाना भी मौजूद थे। उनका मानना है कि सीयह केवल एक विधेयक की हार नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं के अधिकारों, सम्मान और भविष्य के साथ किया गया घोर विश्वासघात है।
उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों के चलते न केवल इस बिल का विरोध किया, बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े हो गए। यह आचरण उनके नेतृत्व की विफलता, दूरदृष्टि के अभाव और महिला सम्मान के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर करता है। जिस प्रकार राहुल गांधी ने सदन के भीतर मेज ठोक कर इस विधेयक के गिराने का एलान किया और इस विधेयक के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया और उसके बाद विपक्षी दलों द्वारा विधेयक के गिरने का जश्न मनाया गया, वह अत्यंत निंदनीय, दुर्भाग्यपूर्ण और लोकतंत्र के मूल्यों का खुला उपहास है। यह स्पष्ट संकेत है कि राहुल गांधी और उनके सहयोगी दल महिलाओं को अधिकार देने के बजाय उन्हें राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौलते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए लाई गई इस ऐतिहासिक पहल को विफल करना “महापाप” से कम नहीं है। राहुल गांधी और विपक्ष ने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के चलते देश की महिलाओं के सपनों को कुचलने का काम किया है, जिसे देश कभी नहीं भूलेगा। कांग्रेस का इतिहास महिलाओं को केवल एक “वोट बैंक” के रूप में देखने का रहा है। दशकों तक इस महत्वपूर्ण मुद्दे को टालना और जब इसे लागू करने का समय आया, तब उसका विरोध करना—यह उनकी दोहरी नीति, अवसरवादी राजनीति और महिला विरोधी मानसिकता का स्पष्ट प्रमाण है। संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। देश की महिलाएं और जागरूक नागरिक इस विश्वासघात का लोकतांत्रिक जवाब देंगे और उन सभी को जवाबदेह ठहराएंगे जिन्होंने उनके अधिकारों को कुचला है।