सत्याग्रह के सिद्धांतों का पालन करते हुए कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे केजरीवाल
दिल्ली: संवैधानिक मूल्यों और न्यायिक निष्पक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जताते हुए आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने उनकी कोर्ट में चल रहे अपने केस की कार्यवाही में आगे न बढ़ पाने की असमर्थता जताई है। उन्होंने कहा है कि वर्तमान मामले की कार्यवाही ‘न्याय होते हुए दिखना चाहिए’ के सिद्धांत का पालन नहीं करती है। उन्होंने कहा कि गांधी जी के सत्याग्रह के सिद्धांतों का पालन करते हुए मैं खुद या वकील के जरिए इस कार्यवाही में भाग नहीं लूंगा। ऐसी कार्यवाही में मेरे खुद के या किसी वकील के जरिए शामिल होने से कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा। यह प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गहन विचार-विमर्श के बाद लिया गया एक कठिन, लेकिन आवश्यक फैसला है।
सोमवार को एक्स पर उन्होंने कहा कि पूरी विनम्रता और न्यायपालिका के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को यह पत्र लिखा है। इसमें सूचित किया है कि गांधी जी के सत्याग्रह के सिद्धांतों पर चलते हुए उनके लिए उनकी अदालत में इस मामले की पैरवी करना (चाहे व्यक्तिगत रूप से या किसी वकील के जरिए) संभव नहीं होगा। उन्होंने यह कठिन फैसला इस स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद लिया है कि उनकी अदालत में चल रही कार्यवाही किसी भी तरह से इस मूलभूत सिद्धांत को पूरा नहीं करती है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। इन कार्यवाहियों में मेरे खुद के या किसी वकील के माध्यम से शामिल होने से कुछ भी सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा।
वहीं, अपने पत्र में उन्होंने न्यायपालिका के प्रति अत्यंत सम्मान व्यक्त करते हुए कहा है कि यह लंबे समय से लोकतंत्र के एक प्रहरी के रूप में खड़ा है और जब अन्य संस्थान लड़खड़ाए, तो इसने बार-बार संवैधानिक मूल्यों को बरकरार रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका पत्र गुस्से में या अनादर में या व्यक्तिगत टकराव की किसी भावना से नहीं लिखा गया है, बल्कि दर्द, विनम्रता और न्यायपालिका की भूमिका में अटूट विश्वास के साथ लिखा गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह मुद्दा एक व्यक्तिगत मामले से बड़ा है, जो न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता में आम नागरिकों के विश्वास को छूता है।न्यायपालिका की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा कि 75 वर्षों से अधिक समय से नागरिकों ने अधिकारों की रक्षा और ज्यादतियों पर रोक लगाने के लिए इसकी ओर देखा है। उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र उद्देश्य न्यायपालिका को मजबूत करना और इसे कमजोर होने से रोकना है।
अपने पहले के रिक्यूजल (सुनवाई से अलग होने के) आवेदन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह इस वास्तविक आशंका के कारण दायर किया गया था कि क्या न्याय केवल होगा ही नहीं, बल्कि होता हुआ दिखेगा भी।
उन्होंने बताया कि 20 अप्रैल 2026 को आवेदन खारिज होने के बाद भी उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने लिखा कि मैं इस दर्दनाक और अपरिहार्य धारणा के साथ रह गया हूं कि मैंने आशंका की एक वैध दलील के रूप में जो आग्रह किया था, उसे एक व्यक्तिगत हमले के रूप में लिया गया और उसी तरह से जवाब दिया गया। उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की व्याख्या ने उनके लिए यह विश्वास करना असंभव बना दिया कि मुझे इस अदालत में ऐसी सुनवाई मिल सकती है जो निष्पक्ष प्रतीत हो।
महात्मा गांधी की शिक्षाओं का जिक्र करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा कि गांधी जी के कार्य सत्याग्रह के सिद्धांत द्वारा निर्देशित थे, जो कोई भी रुख अपनाने से पहले संवाद, आत्मनिरीक्षण और संयम की मांग करता है। उन्होंने लिखा कि यह नफरत से पैदा हुआ विद्रोह नहीं है, न ही अहंकार से पैदा हुई अवहेलना है। यह अंतःकरण का शांत आग्रह है।
अपनी चिंताओं को रेखांकित करते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपने रिक्यूजल आवेदन में उठाए गए दो प्रमुख मुद्दों को दोहराया। पहला, उन्होंने अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के साथ जज के बार-बार सार्वजनिक जुड़ाव की ओर इशारा किया, जिसे उन्होंने सत्ताधारी व्यवस्था के वैचारिक इकोसिस्टम का हिस्सा बताया और ध्यान दिलाया कि आम आदमी पार्टी वैचारिक रूप से उस ढांचे के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस तरह के जुड़ाव ने उनके मन में निष्पक्ष सुनवाई की संभावना के बारे में गंभीर संदेह पैदा कर दिया है।
07:20 pm 27/04/2026