दिल्ली: 1984 के सिखों के कत्लेआम के पीड़ित को इंसाफ दिलाने की लड़ाई पिछले 42 वर्ष से लगातार जारी है। इसी संघर्ष की एक मजबूत आवाज हैं अखिल भारतीय दंगा पीड़ित राहत कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल, जो हर साल अपने साथियों के साथ गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब में अरदास कर क़त्लेआम में शहीद हुए निर्दोष सिखों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं । इसके बाद देश के प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौपकर पीड़ित परिवारों को इंसाफ दिलाने एवं उनकी मांग को सरकार तक पहुचाने का प्रयास करते हैं ।
लेकन इस बार दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि कार्यक्रम और प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौपनी की अनुमित नहीं दिए जाने से विवाद खड़ा हो गया। इस पर कड़ा एतराज जताते हुए जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाये और इसे दंगा पीड़ितों के साथ सौतेला व्यवहार करार दिया । जत्थेदार भोगल ने सवाल किया कि जब अन्य लोगों और संगठन को अपनी बात रखने तथा ज्ञापन सौपने की अनुमित दी जा सकती है, तो 1984 के दंगा पीड़ितों के साथ ऐसा भेदभाव क्यूँ किया जा रहा है? उन्होंने कहा कि उनकी ओर से केवल दो व्यक्तियों के साथ प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौपने की अनुमित मांगी गई थी, लेकिन दिल्ली पुलिस ने इसकी भी मंजूरी नहीं दी। आखिर दंगा पीड़ितों को आवाज उठाने से रोकने की वजह क्या है?
उन्होंने दो टूक कहा कि 1984 के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने का उनका संघष कोई राजनीतिक गितिविधि नहीं, बल्कि उन परिवारों के दर्द और अधिकार की लड़ाई है, जिन्होंने अपने अपन को खोया और चार दशक से अधिक समय बीत जाने के
बावजूद न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं । उन्होंने संकल्प दोहराया कि उनकी यह लड़ाई आखरी सांस तक जारी रहेगी और पीड़ितों को इंसाफ दिलाकर ही दम लेंगे । जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल ने एक महत्वपूर्ण मांग उठाते हुए कहा कि उन्होंने देश के प्रधानमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री और संबंधित सरकारी विभाग से लगातार अपील की है कि दिल्ली के केंद्रीय क्षेत्र में 1984 के सिख कत्लेआम में मारे गए निर्दोष लोगों की याद में एक स्मारक और म्यूजियम बनाया जाए। उनका कहना है कि दिल्ली में ऐसा ऐतिहासिक स्मारक होना चाहिए , जहां आने वाले देश-विदेश के पर्यटक 1984 में सिख समुदाय के साथ हुई भयावह त्रासदी और उस दौर के इतिहास से परिचित हो सकें ।
उन्होंने कहा कि यह म्यूजियम केवल शहीद की याद को संजोने का माध्यम नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को इतिहास की सच्चाई से रूबरू कराने और ऐसी त्रासदी दोबारा न होने का संदेश देने का भी काम करेगा। 42 साल बीत गए, लेकिन इंसाफ की आस आज भी बाकी है। जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल का कहना है कि जब तक 1984
के परिवारों को न्याय नहीं मिलता और शहीद को उनका उिचत संमान नहीं दिया जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा ।