
दिल्ली: भारतीय जनसंघ के 75 वर्ष पूरे होने पर बोले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन कहा कि 1947 में देश आजाद हुआ। पर क्या आजादी के साथ ही भारत का "भारतीयकरण" हो गया था ? नहीं। उस समय देश में 2 धाराएं थीं। एक धारा थी जो सत्ता में थी और भारत को पश्चिम का अनुकरण करवाना चाहती थी। दूसरी धारा थी जो कहती थी - "भारत की आत्मा, भारत का गौरव, भारत की संस्कृति" अपनी हो। 21 अक्टूबर 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दूसरी धारा को राजनीतिक स्वरूप दिया जिसका नाम है भारतीय जनसंघ ।
उन्होने जनसंघ की राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए कश्मीर का तुष्टिकरण मुद्दा उठाया और उनका नारा था - "एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे"। कश्मीर के लिए पूर्ण एकीकरण। एक व्यक्ति, एक निशान, एक विधान। यदि जनसंघ के राजनीतिक इतिहास को देखा जाए तो 1952 का पहला चुनाव जनसंघ के मात्र 3 सांसद। 1957 में यह संख्या बढ़कर 4 हो गई और 1962 के चुनाव में यह संख्या बढ़कर 14 हो गई । 1967 में भारतीय जनसंघ के 35 सांसद थे । 1971 के चुनाव में यह संख्या घटकर 22 रह गई ।
23 जून 1953 को कश्मीर सत्याग्रह के दौरान जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान। दूसरा झटका लगा 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की रहस्यमय मृत्यु से। "एकात्म मानववाद" और "अंत्योदय" का दर्शन देने वाले युगपुरुष अचानक विस्मित हो गये।इन झटकों के बाद भी जनसंघ की यात्रा रुकी नही क्योंकि कार्यकर्ताओं का विकास ऐसे हुआ था की - व्यक्ति आते-जाते हैं, विचार अमर रहते हैं।
25 जून 1975 देश पर आपातकाल लगाया गया। उस रात जनसंघ के एक-एक कार्यकर्ता ने तय किया - "जेल जाएंगे, पर समझौता नहीं करेंगे"। *आपातकाल में जनसंघ के हजारों कार्यकर्ताओं का बलिदान अद्भुत रहा और दिल्ली से लेकर देश भर में हमारे 1 लाख से ज्यादा कार्यकर्ता जेल गए - लाठी डंडे खाये एवं यातनाएं सही। पर "राष्ट्रवाद" और "लोकतंत्र" का नारा नहीं छोड़ा। अटल जी, आडवाणी जी, नानाजी देशमुख जी - सभी जेल में थे।आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव घोषित हुए और जनसंघ का भी देश हित में जनता पार्टी में विलय हुआ। जनता ने कांग्रेस की तानाशाही को हराया।
उद्देश्य एक ही था - कांग्रेस मुक्त भारत। उस सरकार में अटल जी विदेश मंत्री, आडवाणी जी सूचना मंत्री बने। पहली बार डा. मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ की विचारधारा सत्ता में पहुंची।*1979 में कांग्रेस के खेल के शिकार कुछ जनता पार्टी के घटकों ने जनता पार्टी में विलय हुए जनसंघ के सदस्यों के आर.एस.एस. से सम्बंध पर प्रश्न उठाये - मित्रों, परीक्षा यहीं थी। 1979 में जनता पार्टी के भीतर एक सवाल उठा - "क्या जनसंघी लोग अपना दायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति निभाएंगे या सत्ता के प्रति?"
उस दिन अटल बिहारी वाजपेई जी और लालकृष्ण आडवाणी जी ने साफ कहा - "हमारा राष्ट्रवाद ही हमारी निष्ठा है। और संघ हमारी सांस्कृतिक प्रेरणा है। इसे हम नहीं छोड़ सकते"। परिणाम हुआ जनता पार्टी टूटी। सत्ता गई। पर जनसंघ ने 28 साल की तपस्या में जो कमाया था - "स्वाभिमान" - उसे नहीं बेचा। 1951 से 1979 तक - 28 वर्ष - न सत्ता का मोह, न समझौते की राजनीति। केवल राष्ट्र प्रथम 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। कमल का निशान वही, नारा वही - "राष्ट्र प्रथम"।राजनीतिक यात्रा फिर जीरो से शुरू हुई और पार्टी सत्ता के शीर्ष तक पहुँच गई ।