नई दिल्ली 21, Oct 2026

लेख

1 - नाना पाटेकर हुए दुनिया से अलविदा

2 - बकरा मंडी भायखला में पुष्प वर्षा कर हुआ लाल बाग चा राजा का स्वागत

3 - कैसे होंगे केरल के सियासी समीकरण

4 - कौन सा खेला खेलेंगी ममता बैनर्जी पश्चिम बंगाल में

5 - धर्मेंद्र हुए पंचतत्व में विलीन

6 - बिहार की जानता ने फिर एक बार साबित कर दिया कि हथेली में सरसों नहीं उगाया जा सकता

7 - जेट सिक्योरिटी के साथ विसर्जन के लिए निकला लाल बाग का राजा

8 - खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे

9 - एक पृथ्वी एक स्वास्थ्य के लिये योग

10 - ऑपरेशन सिंदूर न्याय की अखंड प्रतिज्ञा

11 - देश के लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए बाबा साहिब का अमूल्य योगदान

12 - दिल्ली सरकार के 100,000करोड़ से क्षेत्र में उन्नति की संभावनाओं को मिलेगी मजबूती

13 - दशक के बाद बिखरा झाड़ू 27 साल बाद खिला कमल फिर एक बार

14 - स्वर्णिम भारत,विरासत और इतिहास पर आधारित इस बार का गणतंत्र दिवस समारोह

15 - महाराष्ट्र में फिर एक बार लहराया बीजेपी का परचम

16 - तमाम कवायदों के बावजूद बीजेपी तीसरी बार हरियाणा में सरकार बनाने को अग्रसर

17 - श्रॉफ बिल्डिंग के सामने कुछ इस अंदाज से हुआ लाल बाग के राजा का स्वागत

18 - प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही शुरू हुआ बीजेपी का सदस्यता अभियान

19 - देश के सीमांत इलाकों में तैनात सैनिकों में भी दिखा 78 वें स्वतंत्रता दिवस का जज्बा

20 - २०२४-२५ के बजट को लेकर सियासत विपक्ष आमने सामने

21 - एक बार फिर तीसरी पारी खेलेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी

22 - केजरिवाल के जमानत पर रिहा होने पर शुरु हुई नई कवायदें

23 - मतदान की दर धीमी आखिर माजरा क्या

24 - क्यूं चलाना चाहते हैं केजरीवाल जेल से सरकार

25 - 2004-14 के मुकाबले 2014-23 में वामपंथी उग्रवाद-संबंधित हिंसा में 52 प्रतिशत और मृतकों की संख्या में 69 % कमी

26 - कर्तव्य पथ दिखी शौर्य की झलक

27 - फ़ाइनली राम लल्ला अपने आशियाने में हो गये हैं विराजमान

28 - राजस्थान का ऊँट किस छोर करवट लेगा

29 - एक बार फिर गणपति मय हुई माया नगरी मुंबई

30 - पत्रकारिता की आड़ में फर्जीवाड़े के खिलाफ एनयूजे(आई) छेड़ेगी राष्ट्रव्यापी मुहीम

31 - भ्रष्टाचार, तुस्टिकरण एवं परिवारवाद विकास के दुश्मन

32 - एक बार फिर शुरू हुई पश्चिम बंगाल में रक्त रंजित राजनीति

33 - नहीं होगा बीजेपी के लिऐ आसान कर्नाटक में कांग्रेस के चक्रव्यूह को भेद पाना

34 - रद्द करने के बाद भी नहीं खामोश कर पायेंगे मेरी जुबान

35 - उत्तर-पूर्वी राज्यों के अल्पसंख्यकों ने एक बार फिर बीजेपी पर जताया भरोसा

36 - 7 लाख तक की आमदनी टैक्स फ्री

37 - गुजरात में फिर एक बार लहराया बीजेपी का परचम

38 - बीजेपी आप में काँटे की टक्कर

39 - सीमित व्यवस्था के बावजूद धूम-धाम से हो रही है छट माइय्या की पूजा

40 - जहाँ आज भी पुजा जाता है रावण

41 - एक बार फिर माया नगरी हुई गणपतिमय

42 - एक बार फिर लहराया तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर

43 - बलवाइयों एवं जिहादियों के प्रति पनपता सहनभूतिक रुख

44 - आजादी के अमृत महोत्सव की कड़ी के रूप में मनाया जा रहा है 8 वाँ विश्व योग दिवस

45 - अपने दिग्गज नेताओं को नहीं संभाल पाई कांग्रेस पार्टी

46 - ज्ञान व्यापी मस्जिद के वजु घर में शिवलिंग मिलने से विवाद गहराया

47 - आखिर क्यूँ मंजूर है इन्हे फिर से वही बंदिशें.....

48 - पाँच में से चार राज्यों में लहराया कमल का परचम

49 - पेट्रोलियम, फर्टिलाइजर एवं खाद्य सामाग्री पर मिलने वाली राहत में लगभग 27 फीसदी की कटौती

50 - जे&के पुलिस के सहायक उप निरीक्षक बाबूराम शर्मा मरणोपरांत अशोक चक्र से संमानित

1947 में देश आजाद हुआ पर क्या आजादी के साथ ही भारत का भरतीयकरण हो गया

 दिल्ली: भारतीय जनसंघ के 75 वर्ष पूरे होने पर बोले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन कहा कि 1947 में देश आजाद हुआ। पर क्या आजादी के साथ ही भारत का "भारतीयकरण" हो गया था ? नहीं। उस समय देश में 2 धाराएं थीं। एक धारा थी जो सत्ता में थी और भारत को पश्चिम का अनुकरण करवाना चाहती थी। दूसरी धारा थी जो कहती थी - "भारत की आत्मा, भारत का गौरव, भारत की संस्कृति" अपनी हो। 21 अक्टूबर 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दूसरी धारा को राजनीतिक स्वरूप दिया जिसका नाम है भारतीय जनसंघ । 

उन्होने जनसंघ की राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए कश्मीर का तुष्टिकरण मुद्दा उठाया और उनका नारा था - "एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे"। कश्मीर के लिए पूर्ण एकीकरण। एक व्यक्ति, एक निशान, एक विधान। यदि जनसंघ के राजनीतिक इतिहास को देखा जाए तो 1952 का  पहला चुनाव  जनसंघ के मात्र 3 सांसद।  1957 में यह संख्या बढ़कर 4 हो गई और 1962 के चुनाव में यह संख्या बढ़कर 14 हो गई । 1967 में भारतीय जनसंघ के 35 सांसद थे । 1971 के चुनाव  में यह संख्या घटकर 22 रह गई ।

23 जून 1953 को कश्मीर सत्याग्रह के दौरान जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान। दूसरा झटका लगा 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की रहस्यमय मृत्यु से। "एकात्म मानववाद" और "अंत्योदय" का दर्शन देने वाले युगपुरुष अचानक  विस्मित हो गये।इन झटकों के बाद भी जनसंघ की यात्रा रुकी नही क्योंकि कार्यकर्ताओं का विकास ऐसे हुआ था की - व्यक्ति आते-जाते हैं, विचार अमर रहते हैं।

25 जून 1975 देश पर आपातकाल लगाया गया। उस रात जनसंघ के एक-एक कार्यकर्ता ने तय किया - "जेल जाएंगे, पर समझौता नहीं करेंगे"। *आपातकाल में जनसंघ के हजारों कार्यकर्ताओं का बलिदान अद्भुत रहा और दिल्ली से लेकर देश भर में हमारे 1 लाख से ज्यादा कार्यकर्ता जेल गए - लाठी डंडे खाये एवं यातनाएं सही। पर "राष्ट्रवाद" और "लोकतंत्र" का नारा नहीं छोड़ा। अटल जी, आडवाणी जी, नानाजी देशमुख जी - सभी जेल में थे।आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव घोषित हुए और जनसंघ का भी देश हित में जनता पार्टी में विलय हुआ। जनता ने कांग्रेस की तानाशाही को हराया।

उद्देश्य एक ही था - कांग्रेस मुक्त भारत। उस सरकार में अटल जी विदेश मंत्री, आडवाणी जी सूचना मंत्री बने। पहली बार डा. मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ की विचारधारा सत्ता में पहुंची।*1979 में कांग्रेस के खेल के शिकार कुछ जनता पार्टी के घटकों ने जनता पार्टी में विलय हुए जनसंघ के सदस्यों के आर.एस.एस. से सम्बंध पर प्रश्न उठाये - मित्रों, परीक्षा यहीं थी। 1979 में जनता पार्टी के भीतर एक सवाल उठा - "क्या जनसंघी लोग अपना दायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति निभाएंगे या सत्ता के प्रति?" 

उस दिन अटल बिहारी वाजपेई जी और लालकृष्ण आडवाणी जी ने साफ कहा - "हमारा राष्ट्रवाद ही हमारी निष्ठा है। और संघ हमारी सांस्कृतिक प्रेरणा है। इसे हम नहीं छोड़ सकते"। परिणाम हुआ जनता पार्टी टूटी। सत्ता गई। पर जनसंघ ने 28 साल की तपस्या में जो कमाया था - "स्वाभिमान" - उसे नहीं बेचा। 1951 से 1979 तक - 28 वर्ष - न सत्ता का मोह, न समझौते की राजनीति। केवल राष्ट्र प्रथम 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। कमल का निशान वही, नारा वही - "राष्ट्र प्रथम"।राजनीतिक यात्रा फिर जीरो से शुरू हुई और पार्टी सत्ता के शीर्ष तक पहुँच गई ।

12:51 pm 21/10/2026

संपादक

डा. अशोक बड़थ्वाल

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