चुनाव आयोग को लेकर हुए खुलासे पर बोले अभिषेक सिंघवी

दिल्ली: चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए सनसनीखेज खुलासों का हवाला देते हुए कहा है कि कांग्रेस पार्टी के कानून, मानवाधिकार एवं आरटीआई विभाग के राष्ट्रीय चेयरमैन एवं राज्यसभा सांसद डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एक सेकेंड के लिए भी अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है और उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा अपने दोनों सहयोगी चुनाव आयुक्तों की असहमति को नजरअंदाज करने का हवाला देकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने ज्ञानेश कुमार पर चुनाव आयोग जैसी देश की प्रमुख संवैधानिक संस्था को तानाशाही एवं एकाधिकारवादी तरीके से चलाकर हाईजैक करने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने कहा कि यह लोकतंत्र और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है तथा भाजपा की 'साम-दाम-दंड-भेद' से चुनाव जीतने की सनक को दर्शाता है । डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग को वन मैन शो की तरह चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जहां एक बुलडोजर मोदी सरकार द्वारा बाहर चलाया जा रहा है, वहीं दूसरा बुलडोजर मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा चुनाव आयोग के भीतर अपने ही साथी चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करके चलाया जा रहा है। उन्होंने तीखा राजनीतिक प्रहार करते हुए कहा कि भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या का कार्यालय खोल रखा है।
उन्होंने खुलासों का हवाला देते हुए बताया गया कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर 14 बार लिखित असहमति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया। मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसा कर सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले की अवहेलना की। उन्होंने सवाल किया कि क्या ज्ञानेश कुमार की नजरों में बाकी चुनाव आयुक्त डमी हैं? नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-छह में बदलाव किए गए। इसमें नए आवेदकों से उनके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने एसआईआर में शामिल होने का ब्योरा मांगा जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2026 में सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लिखित रूप से इस बदलाव को ‘अनधिकृत एवं गैरकानूनी' करार दिया, क्योंकि नियमों के अनुसार इस फॉर्म को बदलने का अधिकार केवल सरकार के पास है। मई 2026 में दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई कि जमीनी स्तर पर वोटर लिस्ट के प्रभारी अधिकारियों यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स को चुनाव आयोग के अपने आईटी पोर्टल का पूरा एक्सेस नहीं दिया जा रहा है और आईटी प्रमुख के माध्यम से इसे प्रतिबंधित किया जा रहा है। अगस्त 2026 में संधू ने लिखित सवाल पूछा कि पश्चिम बंगाल में लगभग 16 लाख मामलों में चुनाव आयोग की ओर से अपील दायर करने की अनुमति किसने दी। डॉ. सिंघवी ने मांग की कि पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए दोनों चुनाव आयुक्तों की असहमति संबंधी सभी टिप्पणियां देश के सामने सार्वजनिक की जाएं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सर्वोच्च अधिकारी नहीं, बल्कि समकक्षों में प्रथम हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग बहुमत से निर्णय लेने वाली संस्था है और फैसले लेने की प्रक्रिया में हर चुनाव आयुक्त को अपनी बात कहने का हक देना चाहिए। आंकड़ों का जिक्र करते हुए डॉ. सिंघवी ने देशभर में चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देशभर में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं, और यह संख्या 15 करोड़ तक पहुंच सकती है। एसआईआर के पहले और दूसरे चरण में 7.8 करोड़ मतदाताओं (13%) के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। वर्तमान में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहे तीसरे चरण में 36 करोड़ मतदाताओं में से अब तक 6.18 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, 5.43 करोड़ मतदाताओं को संदिग्ध बताते हुए उन्हें अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने का नोटिस दिया गया है। इस प्रकार के कठोर नियमों का सबसे बड़ा नुकसान समाज के वंचित, गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को भुगतना पड़ता है, जिनके पास दस्तावेज जुटाने या अदालतों के चक्कर लगाने के संसाधन नहीं होते।
06:15 pm 24/09/2026