हवारा के जेल तबादले का विरोध सिख विरोधी सोच

दिल्ली: जगतार सिंह हवारा को दिल्ली की जेल से पंजाब की जेल में स्थानांतरित करने की मांग का दिल्ली सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में विरोध किए जाने को शिरोमणि अकाली दल के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने गंभीर और चिंताजनक मामला बताया । 17 सितंबर 2026 को दिल्ली सरकार ने सुरक्षा का हवाला देते हुए भाई हवारा को पंजाब की जेल में भेजने का विरोध किया है, जिसकी अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भाई हवारा को पंजाब क्यों नहीं लाया जा रहा, सवाल यह भी है कि एक सिख कैदी के जेल तबादले तक को सरकार इतना बड़ा सुरक्षा मामला क्यों बना रही है? सरना ने इस रुख को उस सरकारी रवैये की अगली कड़ी बताया, जिसमें लंबे समय से बंद सिख कैदियों से जुड़े मामले कानूनी प्रक्रिया के नाम पर लंबित होते आ रहे हैं। इससे पहले प्रो. दविंदरपाल सिंह भुल्लर की समय से पहले रिहाई की अर्जी भी दिल्ली सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा खारिज की गई थी। एक तरफ कानून और सुरक्षा के हवाले, दूसरी तरफ दशकों की कैद—आखिर इन फैसलों के पीछे सरकारी नीति क्या है, यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।
सरना ने सिख मंत्रियों और नेताओं की चुप्पी पर भी तीखा सवाल उठाया है, जो सत्ता से बाहर रहते हुए बंदी सिंहों की रिहाई को अपना राजनीतिक फर्ज बताते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब वोट मांगने हों तो बंदी सिंह याद आ जाते हैं, लेकिन जब सरकारी कुर्सी पर बैठकर फैसले के सामने खड़े होने का समय आता है तो वही आवाज कहां गायब हो जाती है? सिख संगत अब केवल बयान नहीं, बल्कि कार्रवाई का हिसाब मांग रही है। सरना ने सवाल किया कि जो नेता कभी सरकारों को बंदी सिंहों और नवंबर 1984 के सिख कत्लेआम के मामलों पर घेरने की बातें करते थे, वे आज सरकार का हिस्सा बनकर कितनी बार अपनी ही सरकार के पास यह मुद्दा लेकर गए हैं? क्या सत्ता की कुर्सी इतनी भारी हो गई है कि उसके नीचे बंदी सिंहों की पुकारें भी दब गई हैं? चुप्पी भी एक राजनीतिक स्थिति बन जाती है और अब संगत यह जानना चाहती है कि सिख मंत्री सरकारी फैसलों के साथ खड़े हैं या उन अधिकारों के साथ, जिनके लिए वे सत्ता से बाहर रहते हुए आवाज उठाते रहे हैं।
सरना ने सरकार से सीधे सवाल करते हुए कहा कि यदि भाई हवारा को पंजाब की जेल में स्थानांतरित करने का विरोध सुरक्षा कारणों से किया जा रहा है तो वे सुरक्षा कारण क्या हैं और उनका आधार क्या है—इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि मापदंड कानून है तो वही कानूनी मापदंड सभी मामलों में समान रूप से दिखाई देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारों को अपने फैसलों की पारदर्शी व्याख्या देनी होगी और सिख नेताओं को भी यह बताना होगा कि वे बंदी सिंहों के मामले में वास्तव में क्या कर रहे हैं। सरना ने कहा कि दशकों से जेलों में बंद सिख कैदियों के मामलों को हर बार राजनीतिक अवसर के अनुसार याद करना सिख संगत के जख्मों के साथ न्याय नहीं है। यदि सरकार के पास भाई हवारा का जेल तबादला रोकने के कारण हैं तो वे सामने आएं और यदि सिख मंत्रियों के पास सरकार से सवाल करने की ताकत है तो वे भी सामने आएं। क्योंकि अब सवाल बयान देने का नहीं, सवाल यह है कि दशकों से बंदी सिंहों के बंद दरवाजे खोलने के लिए वास्तव में कौन खड़ा होता है।
07:46 pm 18/09/2026